राजस्थान का प्रमुख नृत्य कौन सा है?
राजस्थान का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय लोक नृत्य घूमर है, इसे 'नृत्यों का सिरमौर' भी कहा जाता है।
घूमर राजस्थान का सबसे लोकप्रिय और पारंपरिक लोक नृत्य है, जिसे 'लोक नृत्यों की आत्मा' और राज्य नृत्य का दर्जा प्राप्त है।
यह मुख्य रूप से गणगौर पर्व, विवाह समारोहों और अन्य मांगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा किया जाता है।
उत्पत्ति: इस नृत्य की शुरुआत भील जनजाति द्वारा माँ सरस्वती की वंदना के लिए की गई थी, जिसे बाद में राजघरानों और राजपूत महिलाओं ने अपना लिया।
पहनावा और नाम: इसमें महिलाएं भारी कढ़ाई और दर्पण के काम वाले रंग-बिरंगे घाघरे (जिसे 'घूम' कहा जाता है) और कुर्ती-कांचली पहनती हैं।
नृत्य के दौरान जब वे गोल घूमती हैं, तो इस लहंगे का घेरा बहुत सुंदर दिखाई देता है।
नृत्य शैली: इस नृत्य में महिलाएं एक बड़े घेरे में अंदर और बाहर जाते हुए चक्कर लगाती हैं और हाथों को लचकदार तरीके से घुमाती हैं।
संगीत व ताल: यह नृत्य मंद गति से आठ मात्रा के 'कहरवे' (सवाई) ताल पर किया जाता है। इसमें ढोल, नगाड़ा और शहनाई जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है और साथ में पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं।
घूमर के अलावा, राजस्थान अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यहाँ के अन्य प्रमुख लोक नृत्य इस प्रकार हैं:
कालबेलिया नृत्य: यह राजस्थान की कालबेलिया जनजाति द्वारा किया जाता है। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसे यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया है।
तेरह ताली नृत्य: यह कामद समुदाय की महिलाओं द्वारा किया जाता है, जिसमें शरीर पर 13 मंजीरे बांधकर अद्भुत कला दिखाई जाती है।
चरी नृत्य: यह किशनगढ़ क्षेत्र में गुर्जर समुदाय की महिलाओं द्वारा सिर पर जलता हुआ चरा (बर्तन) रखकर किया जाता है।
भवाई नृत्य: यह अपने करतबों और संतुलन के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें नर्तकी सिर पर कई मटके या कांच के गिलास रखकर नृत्य करती है।
अग्नि नृत्य: यह जसनाथी संप्रदाय के लोगों द्वारा धधकते हुए अंगारों पर किया जाता है।
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